इतिहास और पौराणिक उत्पत्ति
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने पृथ्वी को वज्रनाश नामक राक्षस के अत्याचारों से मुक्त कराने के लिए पुष्कर में एक भव्य यज्ञ का आयोजन किया था। अनुष्ठान के समय उनके हाथ से एक कमल का फूल पृथ्वी पर गिरा, जिससे तीन स्थानों पर पवित्र जलधाराएँ फूट पड़ीं और इस तरह पवित्र पुष्कर सरोवर का निर्माण हुआ।
इसके बाद भगवान ब्रह्मा ने यज्ञ के संपादन के लिए पुष्कर को चुना और यहीं उनका विवाह देवी गायत्री से हुआ। इस दूसरे विवाह से क्रोधित होकर उनकी ज्येष्ठ पत्नी देवी सावित्री ने उन्हें श्राप दिया कि पूरे भूलोक पर पुष्कर के अलावा कहीं भी उनकी पूजा नहीं की जाएगी। यही प्राचीन पौराणिक कारण है कि पूरे विश्व में ब्रह्मा जी का केवल यही एक प्रमुख मंदिर है।
"पृथ्वी पर केवल एक ही ऐसी जगह है जहाँ भगवान ब्रह्मा की पूजा की जाती है — और वह पावन स्थल पुष्कर है, जो एक ही दैवीय क्षण में धन्य भी हुआ और शापित भी।"
वर्तमान मंदिर की मुख्य संरचना 14वीं शताब्दी की है, हालाँकि यह पवित्र स्थल दो हज़ार से अधिक वर्षों से एक पूजनीय उपासना केंद्र रहा है। पौराणिक मान्यता के अनुसार मूल मंदिर का निर्माण महर्षि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। बाद में 8वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने इसका जीर्णोद्धार किया और गर्भगृह में चतुर्मुख ब्रह्मा मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा की। इसके बाद रतलाम के महाराजा जवत राज ने इसका पुनर्निर्माण करवाया।
वास्तुकला की विशेषताएँ
यह मंदिर हिंदू स्थापत्य कला की पारंपरिक राजस्थानी शैली में निर्मित है, जिसकी मुख्य विशेषताएँ हैं:
- एक भव्य लाल रंग का शिखर जो पूरे पुष्कर नगर से दूर से ही दिखाई देता है
- मुख्य गर्भगृह में विराजमान चांदी से सुसज्जित भगवान ब्रह्मा की अत्यंत सुंदर चतुर्मुखी प्रतिमा
- संगमरमर से बना एक भव्य आंगन (प्रांगण) जिसके फर्श पर कछुए की पवित्र चांदी की आकृति जड़ी है
- मुख्य परिसर में देवी सावित्री, गायत्री, लक्ष्मी, नारायण और भगवान शिव को समर्पित सहायक मंदिर
- पत्थरों पर उकेरी गई बारीक नक्काशी जो ब्रह्म पुराण के पौराणिक प्रसंगों को दर्शाती है
प्रवेश द्वार पर स्थित मुख्य ध्वज स्तंभ (ध्वज स्तंभ) पर ब्रह्मा जी के वाहन 'हंस' की लाल पत्थर की आकृति उकेरी गई है। इसकी तीन बार परिक्रमा करना भक्तों के लिए बेहद मंगलकारी माना जाता है।
मंदिर का समय और आरती का कार्यक्रम
5:00 पूर्वाह्न से 6:00 पूर्वाह्न। भोर की पहली पावन आरती जो भगवान ब्रह्मा को जगाने के अनुष्ठान के साथ शुरू होती है।
7:00 पूर्वाह्न से 8:00 पूर्वाह्न। भगवान का दिव्य सुबह का श्रृंगार समारोह — इस समय भीड़ अपेक्षाकृत कम होती है।
6:30 अपराह्न से 7:30 अपराह्न। शाम की भव्य और मनमोहक महाआरती। इसमें सबसे ज़्यादा श्रद्धालु शामिल होते हैं।
8:30 अपराह्न से 9:00 अपराह्न। रात में मंदिर के कपाट बंद होने से पहले की अंतिम शयन आरती।
आगंतुकों के लिए नियम
कैसे पहुँचें
ब्रह्मा मंदिर पुष्कर नगर के ठीक केंद्र में, मुख्य ब्रह्मा घाट से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। पुष्कर के किसी भी गेस्टहाउस या होटल से यहाँ पैदल आसानी से पहुँचा जा सकता है।
- पुष्कर मुख्य बस स्टैंड से: 10 मिनट की पैदल दूरी (700 मीटर)
- ब्रह्मा घाट से: 5 मिनट की पैदल दूरी (400 मीटर)
- अजमेर (निकटतम रेलवे स्टेशन) से: 14 किमी — साझा ऑटो, स्थानीय बस या टैक्सी लें





